उत्तराखंड में कदम बढ़ाता किताब कौतिक। | Kitab Kautik Uttarakhand

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  • चारु तिवारी

संचार के युग में माना जा रहा है कि लोगों में पढ़ने की रुचि कम हुई है। नई पीढ़ी पुस्तकों से दूर हो रही है। इस बात में कुछ हद तक सच्चाई भी है, लेकिन आज भी किताबें ही ज्ञान का सबसे बड़ा साधन हैं। उन्हीं पर पाठक विश्वास करते हैं। पढ़ने की संस्कृति को लेकर हो रहे नये प्रयोगों ने अब युवाओं को किताबों की दुनिया में लौटने के प्रति रुचि जगाई है। उत्तराखंड में चल रहे इस तरह के अभियान के तहत इन दिनों राज्य के विभिन्न हिस्सो में ‘किताब कौतिक’ अर्थात पुस्तक मेलों का आयोजन एक अभिनव प्रयोग है। कुछ युवाओं की पहल ने इसे विस्तार देना शुरू किया है। ‘क्रिएटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड़’ और स्थानीय संगठनों और नागरिकों के सहयोग से अब तक छह ‘किताब कौतिक’ आयोजित हो चुके हैं। टनकपुर, बैजनाथ, चंपावत और पिथौरागढ़, द्वाराहाट के बाद पिछले दिनों नैनीताल जनपद के भीमताल में यह ‘किताब कौतिक’ संपन्न हुआ। अब इसका स्वरूप व्यापक हो रहा है। आने वाले दिनों में इस तरह के पुस्तक मेले उत्तराखंड के दूरस्थ स्थानों में लगेंगे। इन मेलों में कैरियर काउंसिलिंग, लेखकों से बातचीत, स्थानीय इतिहास पर व्याख्यान, प्रकृति को जानने के लिए नेचर वाॅक, विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों के व्याख्यान, पुस्तक लोकार्पण जैसे आयोजन होते हैं। तीन दिवसीय इस पुस्तक मेले में पचास प्रकाशकों की लगभग साठ हजार पुस्तकों के अलावा देशभर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, रंगकर्मी, पत्रकार, कलाधर्मी शामिल होते हैं।


‘किताब-कौतिक’ की शुरुआत एक लंबी सांस्कृतिक-सामाजिक बोध का परिणाम है। कुछ युवा साथियों ने इसकी शुरुआत की थी, जिनमें हेम पन्त, दयाल पांडे और हिमांशु पाठक (रिस्की) प्रमुख हैं। इस अभियान की शुरुआत करने की प्रेरणा, सहयोग और मार्गदर्शन उत्तराखंड के प्रशासनिक अधिकारी और रचनात्मकता से भरे हिमांशु कफल्टिया रहे हैं, जो कई नागरिक पुस्तकालयों की स्थापना कर चुके हैं। इस ‘किताब कौतिक’ में एक अभिभावक के रूप में जुड़े पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डा. ललित मोहन उप्रेती का योगदान अतुलनीय है। किताब कौतिक’ ने सबसे बड़ा का दूरस्थ क्षेत्रों में पुस्तकें पहुंचाने और लोगों में पढ़ने की संस्कृति को लेकर तो काम किया ही है साहित्य, संगीत, कला, पत्रकारिता, फिल्म आदि क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं का छात्रों से परिचित कराने का काम किया है। पहाड़ की उन तमाम संस्थाओं, प्रयासों और व्यक्तियों के बीच भी समन्वय का काम किया है जो ‘पढने की संस्कृति ‘ को लेकर काम कर रहे हैं। ‘किताब कौतिक’ के पहले दिन अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट काम करने वाली प्रतिभाएं नजदीकी दस से बारह स्कूलों में बच्चों से बातचीत करते हैं। मुख्य आयोजन स्थल पर लेखकों से बातचीत, पुस्तकों की समीक्षाएं, अलग-अलग विषयों पर संगोष्ठी, पुस्तकों का लोकार्पण, बच्चों के बीच कई रचनात्मक प्रतियोगिता, क्षेत्र के इतिहास को जानने के लिए इतिहासविदों के व्याख्यान, विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशिष्ट योगदान देने वालों का सम्मान, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन किया जाता है


पढ़ने की संस्कृति को लेकर उत्तराखंड में इस तरह के कई प्रयोग किये जा रहे हैं, जो युवाओं को पुस्तकों को पढ़ने और अन्य रचनात्मक कार्यो को करने की प्रेरणा दे रहे हैं। यह आयोजन इन लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़ने का रास्ता भी तैयार कर रहा है। पिथौरागढ़ में ‘आरंभ’ नाम से युवाओं ने पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए बड़ा काम किया है। हर सप्ताह युवा किसी मैदान में इकट्ठा होकर नई पुस्तक पर चर्चा करते हैं। पढ़ने की संस्कृति को लेकर पोस्टर, कविता पोस्टर आदि से भी युवाओं का जोड़ते हैं। उन्होंने पुस्तकालय खोलने की पहल भी की है। यह वही ग्रुप है जिसने पिथौरागढ़ से देश-दुनिया में चर्चित ‘पुस्तक आंदोलन ‘ चलाया था। राज्य में शिक्षकों के एक गु्रप ने ‘शैक्षिक दखल’ नाम से पत्रिका निकालकर शिक्षा के सवालों और पढ़ने को लेकर नया माहौल बनाया है। शिक्षकों ने इसी गु्रप ने बच्चों में रचनात्मकता बढ़ाने के लिए ‘दीवार पत्रिका’ जैसे अभिनव प्रयोग किये हैं। ‘झोला पुस्तकालय’ का अभियान चलाकर गांव-गांव में पुस्तकें भेजने का काम किया है। नैनीताल जनपद के कोटाबाग में शुभम बधानी ने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक पुस्तकें पहुंचाने के लिए ‘घोड़ा लाइबे्ररी’ की शुरुआत की है। उनका कहना है कि जहां यातायात के साधन नहीं हैं वहां के बच्चों के लिए घोड़े के माध्यम से पुस्तकें पहुचाई जायेंगी। पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र के 22 गांवों में पुस्तकालय से चेतना जगा रहे सुनील कोहली जैसे युवा ‘किताब कौतिक’ का हिस्सा बने हैं। अब विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थान भी इसमें रुचि ले रहे हैं।


पढ़ने की संस्कृति के इन प्रयोगों से जहां किताबों के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ रही है, वहीं वे नये तरह के रचनात्मक कार्यो से भी जुड़ रहे हैं। उत्तराखंड में पढ़ने की नई चेतना ने युवाओं के सोचने के तरीकों को भी बदला है। ‘किताब कौतिक’ जैसे अभियान किसी बड़े शहर के बजाए छोटी जगहों पर हो रहे हैं। यहां दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र के स्कूली बच्चे अपनी कई तरह की प्रस्तुतियों के साथ शामिल होते हैं। उनके लिए कैरियर काउंसिलिंग, चित्रकला, स्थानीय कलाओं जैसे ‘ऐपण’ प्रतियोगिता, नक्षत्र विज्ञान कार्यशाला, नेचर वाॅच जैसे रुचिपूर्ण कार्यक्रम तो हैं ही वह इन पुस्तक मेलों के माध्यम से देशभर से आये साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, अध्येताओं से मिल भी रहे हैं। इन ‘किताब कौतिक’ अर्थात ‘पुस्तक मेलों’ की विशेषता यह भी है कि ये स्थानीय लोगों और अभिभावकों के सहयोग से आयोजित किये जा रहे हैं। पहले कुछ जगहों पर स्थानीय प्रशासन ने रुचि दिखाई थी, लेकिन अब ये मेले पूरी तरह से जनता के सहयोग से चलाये जा रहे हैं। पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय इतिहास, संस्कृति, भाषा और सरोकारों के साथ युवाओं को जोड़ने एवं उनका अन्य समाजों, भाषाओं, इतिहास, संस्कृति के साथ संवाद कराने से उनमें एक व्यापक समझ भी पैदा हो रही है।

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अभी छठा किताब कौतिक’ नैनीताल जनपद के भीमताल में संपन्न हुआ। ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय में आयोजित इस कौतिक में हेम पन्त, दयाल पांडे और हिमांशु पाठक के अलावा जिस व्यक्ति का महत्वपूर्ण योगदान रहा वह हैं हमारे बहुत गहरे मित्र और स्नेही संजीव भगत। संजीव भाई एक सफल उद्यमी के अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक सरोकारों से जुड़े हैं। ग्राफिक एरा के निदेशक मनोज लोहनी ने जिस मनोयोग से इस आयोजन में सहयोग किया उनके लिए आभार के लिए शब्द नहीं हैं। इस बार के अतिथियों में सुप्रसिद्ध पुराविद् चित्रकार यशोधर मठपाल, इतिहासकार शेखर पाठक, उत्तराखंड चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति डा. हेम पांडे, कृषि विज्ञान और पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर बीएस बिष्ट, सुप्रसिद्ध चिंतक प्रोफेसर पुष्पेश पंत, उत्तराखंड के राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट, चर्चित लेखक नवीन जोशी, सुप्रसिद्ध लोक अध्येता डा. प्रयाग जोशी, जाने-माने लेखक-अनुवादक अशोक पांडे, सुपरिचित पक्षी विशेषज्ञ राकेश भट्ट। लखनऊ से आये शिक्षाविद शांतुल शुक्ल, वैज्ञानिक सतीश पंत, वनस्पतिशास्त्री डा. बीएस कडाकोटी, नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह, उत्तरा की संपादक प्रो. उमा भट्ट, बाल साहित्यकार उदय किरौला, दिल्ली के शिक्षा विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डा. राजेश्वरी कापड़ी, जनरोकारों के लिए समर्पित पत्रकार जगमोहन रौतेला, सुप्रसिद्ध रंगकर्मी डा. सुवर्ण रावत, हिमांशु जोशी, उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध लोक गायिकाएं ज्योति उप्रेती सती-नीरजा उप्रेती (उप्रेती सिस्टर्स), जाने-माने जनकवि बल्ली सिंह चीमा, सुप्रसिद्ध लोकगायक प्रहलाद मेहरा, युवाओं की लोकप्रिय जोड़ी ‘घुघुती जागर’ शामिल थे।
इस आयोजन की सफलता में कई लोगों का योगदान रहा, जिनमें युवा कवि हर्ष काफर, द्वाराहाट के पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी, सामाजिक कार्यकर्ता हेमा हर्बोला, अल्मोड़ा में हिन्दी विभाग की प्रोफेसर ममता पंत, डां. नंदन बिष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता और कवि त्रिभुवन बिष्ट, शिक्षिका दीप्ति भट्ट, हस्तशिल्पी मंजू साह, एपण शिल्पी यामिनी पांडे शामिल हैं।

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