अनूठी परम्परा: माँ भगवती को अर्पित होती हैं 500 ग्राम की हजारों पूड़ियाँ

माँ भगवती का यह सुप्रसिद्ध मंदिर है पोथिंग गांव में, जो बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है, लेकिन भादो के महीने में होने वाली पूजा में अपार जन समुदाय उमड़ आता है। इस दौरान

January 27, 2026 10:20 PM
Unique tradition 500 gram Puri Bhagawati Temple

उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल अंचल में हर वर्ष भादो के महीने में माँ नंदा देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान माँ नंदा को उनके ससुराल कैलाश विदा करने से पूर्व वे श्रद्धाभाव से उनकी पूजा-अर्चना वही पुरानी परम्पराओं और रीति-रिवाजों के साथ करते हैं। इन्हीं लोक परम्पराओं में से एक अनूठी परम्परा बागेश्वर जिले के पोथिंग गाँव में आज भी जीवित है। 

देवभूमि के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित परम्परा के अनुसार ही इस महिमामयी धाम में ग्रामीण माँ नंदा को नए चावल, मक्का, ककड़ी आदि जैसी घरेलू चीज़ें अर्पित करते हैं। साथ ही माँ को भोग में विशेष पूड़ियाँ चढ़ाते हैं। इन पूड़ियों की खासियत है यह है कि इनका आकार और वजन साधारण पूड़ी की भांति नहीं होता, बल्कि हर पूड़ी का वजन लगभग 400 से 500 ग्राम तक होता है। आइये जानते हैं इस शक्तिस्थल और यहाँ की अनूठी परम्परा के बारे में –

माँ भगवती का यह सुप्रसिद्ध मंदिर है पोथिंग गांव में, जो बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है, लेकिन भादो के महीने में होने वाली पूजा में अपार जन समुदाय उमड़ आता है। इस दौरान यहाँ प्रतिपदा से लेकर अष्टमी या पंचमी तिथि तक यहाँ माँ नंदा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

  • पुरानी परम्परा के अनुसार यहाँ मंदिर में एक साल आठ्यूं (आठों) और एक वर्ष सौपाती (स्योपाती) का आयोजन होता है। 
  • आठों पूजा आठ दिन की और स्योपाती पांच दिन की होती है। 
  • प्रतिपदा से सप्तमी या चतुर्थी तिथि तक मंदिर में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं और रात में जागरण होता है।
  • आठों पूजा में उत्तरोड़ा गांव से लाये कदली वृक्ष के तनों से माँ नंदा की मूर्ति बनाई जाती है और स्योपाती पूजा में पाती से माँ नंदा की मूर्ति बनाने की परम्परा चली आ रही है। इस मूर्ति को लोग ‘मुख़ार’ अथवा ‘डिकर’ के नाम से जानते हैं। 
  • माँ नंदा के इस मुख़ार के दर्शन श्रद्धालुओं को एक दिन के लिए गर्भगृह में होते हैं।  
  • आठों पूजा के अवसर पर अष्टमी तिथि को मुख्य मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और दूर-दूर से आए भक्त विधिवत पूजा कर माँ से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
  • वहीं स्योपाती पूजा के अवसर पर पंचमी के दिन श्रद्धालुओं को माँ नंदा भगवती के मुख़ार दर्शन होते हैं।  

इस अवसर पर पोथिंग में उत्तराखंड के विभिन्न जिले से श्रद्धालु पहुँचते हैं और मनौती माँगते हैं। मनौती पूर्ण होते ही आगामी वर्षों की पूजा के दौरान वे माँ को घंटियां, सोने-चाँदी के आभूषण, छत्र, ढोल-नगाड़े, झांजर, भकौर, निशाण आदि अर्पित करते हैं।

मोटी वजनी पूड़ियों का भोग 

नंदा भगवती माता पूजा के दिन पोथिंग गाँव में मोटी वजनी पूड़ियाँ बनाने की परम्परा बुजुर्गों के समय से चली आ रही है। इन पूड़ियों का वजन 400 ग्राम से लेकर 500 ग्राम या कभी-कभी इससे भी अधिक होता है। 

  • प्रतिपदा तिथि को यहाँ मंदिर में ग्रामीणों द्वारा माता को अनाज (गेहूँ) अर्पित करने की परम्परा है। इसी गेहूं को विशेष रूप से माँ नंदा के घराट (पनचक्की) में शुद्धता और पूर्ण विधि-विधान से पीसा जाता है।
  • ग्रामीण गेहूँ के इस आटे को मंदिर तक पहुंचाते हैं। मुख्य पूजा के दिन मंदिर के पूर्वोत्तर में बनी रसाई में ले जाकर श्रद्धालु इस आटे से माता के लिए पूड़ियाँ बनाते हैं।   
  • इन पूड़ियों की संख्या हजारों में होती हैं, यहीं भक्तों को प्रसाद स्वरूप वितरित की जाती हैं।

मंदिर में पहुंचे श्रद्धालु प्रसाद प्राप्त करने के लिए भक्त घंटों कतार में खड़े रहते हैं और प्रसाद के रूप में इस भारी-भरकम पूड़ी को प्राप्त कर माथे से लगाते हैं। 

पोथिंग की परम्परा क्यों है खास?

मोटी वजनी पूड़ी बनाने की यह परम्परा केवल पोथिंग गाँव के भगवती मंदिर में ही देखने को मिलती है, जो करीब 250 से अधिक वर्षों चली आ रही है। माँ भगवती को इन्हीं पूड़ियों का भोग लगाया जाता है। ये पूड़ियाँ आकार में चौड़ी और काफी मोटी होती है, जिस कारण इसका वजन 400 ग्राम से 500 ग्राम या इससे भी अधिक होता है। वहीं ये पूड़ियाँ हजारों की संख्या में बनाई जाते हैं ताकि सभी श्रद्धालुओं ये प्रसाद स्वरुप प्राप्त हो सके। 

इस पूड़ी की एक खासियत यह है कि 10 दिन तक भी ये खराब नहीं होतीं और स्वाद भी जस का तस बना रहता है। वहीं इतनी मोटी होते हुए भी इसमें कच्चेपन की कोई शिकायत नहीं होती। लोग इस पूड़ी के प्रसाद को अपने रिश्तेदारों और मित्रों को दूर-दूर तक भिजवाते हैं। 

आज के बदलते दौर में जहाँ कई परम्पराएँ लुप्त हो चुकी हैं, वहीं पोथिंग गाँव के लोग अपने पूर्वजों की इस धरोहर को आज भी उसी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभा रहे हैं।

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पोथिंग गाँव की यह अद्भुत परम्परा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामूहिक सहयोग, संस्कृति और समाज की एकता की मिसाल भी है। माँ नंदा भगवती की यह अनूठी पूजा और भारी-भरकम पूड़ियों की परम्परा उत्तराखंड की विरासत को और भी जीवंत बनाती है।

Vinod Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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