उत्तराखंड का ऐसा शिव मंदिर, जहाँ नहीं होती पूजा: ‘एक हथिया देवाल’

On: Wednesday, July 23, 2025 7:04 PM
एक हथिया देवाल

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, अपने धार्मिक स्थलों, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। लेकिन इस धरती पर एक ऐसा भी मंदिर मौजूद है, जहां पूजा नहीं होती, न आरती, न घंटियों की आवाज़ और न ही कोई धार्मिक अनुष्ठान। इस रहस्यमयी मंदिर का नाम है “एक हथिया देवाल”, जो शिल्पकला की दृष्टि से तो अद्वितीय है, परंतु आस्था की दृष्टि से एक अभिशप्त मंदिर माना जाता है। लोग यहाँ भगवान शिव के दर्शन तो करते हैं लेकिन पूजा किये बिना की घर को लौट जाते हैं। 

कहाँ स्थित है ‘एक हथिया देवाल’?

पिथौरागढ़ जिले से लगभग 56 किलोमीटर दूर, एक सुन्दर कस्बा है थल। यह वह स्थान है जहाँ रामगंगा नदी और उसकी सहायक धाराओं का संगम होता है। यहीं पास के बलतिर गांव में स्थित है यह ऐतिहासिक मंदिर ‘एक हथिया देवाल’। 

मंदिर का इतिहास और निर्माण

इस मंदिर का निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। यह मंदिर पूरी तरह एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है, जो इसे शिल्पकला का अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण बनाता है। मंदिर की स्थापत्य कला नागर और लैटिन शैली की है। मंदिर के मंडप की ऊंचाई  1.85 मीटर और चौड़ाई 3.15 मीटर है, जिसका प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा से है। 

इस मंदिर का नाम एक हथिया देवाल क्यों पड़ा ? इसके पीछे लोगों में का मानना है कि इसका निर्माण सिर्फ एक हाथ से हुआ था। एक हथिया देवाल का अर्थ है-एक हाथ से बना हुआ देवालय यानि मंदिर।  

ऐसी मान्यता है कि चोल साम्राज्य का एक प्रसिद्ध राज शिल्पी, जिसकी एक भुजा (हाथ) काट दी गई थी ताकि वह अपने जैसी कलाकृति दोबारा कहीं और न बना सके। राज्य से निष्काषित होकर वह उत्तर की ओर हिमालय में शरण की तलाश में भटकता हुआ अलमिया राजाओं के क्षेत्र में पहुँचा। राजा ने उसे शरण देने से पहले एक शर्त रखी  कि वह अपनी कला की उत्कृष्टता सिद्ध करे।

शिल्पी ने राजा की शर्त को स्वीकार कर लिया और उसी रात एक ही शिला पर अपने औजारों से संपूर्ण मंदिर गढ़ डाला। परंतु एक भूल ने इस अद्भुत कृति को कभी पूज्य नहीं बनने दिया। क्योंकि जल्दबाजी या दिशा ज्ञान के अभाव में शिल्पी ने शिवलिंग के अरघा की दिशा दक्षिण की ओर कर दी, जबकि अरघा की दिशा उत्तर की ओर होती है। इस प्रकार विपरीत दिशा वाले शिवलिंग की पूजा शास्त्रों में निषेध मानी जाती है। शर्त हारने पर शिल्पी पुनः हिमालय की गहराइयों में लुप्त हो गया और मंदिर बिना पूजा के, इतिहास की परछाइयों में खो गया और आज तक मंदिर में विराजमान शिवलिंग की पूजा नहीं हो सकी। 

ek hathiya Dewal
एक हथिया देवाल-थल (पिथौरागढ़ )

एक हथिया देवाल के निर्माण से सम्बंधित एक किवदंती यह भी प्रचलित है कि यहाँ के गांव में एक शिल्पी रहता था। एक दुर्घटना में वह अपना हाथ गँवा बैठा। लेकिन अपने जज्बे से वह अभी भी अपनी इस कला को जीवित रखना चाहता था। लेकिन ग्रामीण उसे ताने मारते थे कि अब वह एक हाथ से कुछ नहीं कर सकता। इससे दुःखी होकर उसने गांव छोड़ने का निर्णय लिया और एक रात घर से अपने औजारों के साथ निकल पड़ा। 

सुबह होने पर ग्रामीणों ने पास के ही एक चट्टान में एक सुन्दर कलाकृति वाले मंदिर को पाया। जब स्थानीय पुरोहितों ने मंदिर में बने शिवलिंग और मूर्ति को देखा तो वे विपरीत दिशा की ओर बने थे। शिवलिंग का अरघा दक्षिणमुखी था, जिसकी पूजा फलदायी नहीं हो सकती थी और आज तक कोई पूजा नहीं करता है। 

कला की अनमोल धरोहर

‘एक हथिया देवाल’ न सिर्फ स्थापत्य कला की दृष्टि से बल्कि किस्सों और किंवदंतियों के लिहाज़ से भी खास है। एक ही पत्थर से बना यह मंदिर आज भी आने वाले पर्यटकों को अपनी अनूठी शिल्पकला से आकर्षित करता है, लेकिन विडंबना यह है कि यह मंदिर आज संरक्षण और पहचान की बाट जोह रहा है।

बिना पूजा का मंदिर-एक गूढ़ विरासत

यह मंदिर उन गिने-चुने धार्मिक स्थलों में से एक है जहाँ पूजा नहीं होती। इसका कारण केवल स्थापत्य दोष नहीं, बल्कि उस शिल्पी की करुण कथा भी है, जो इस कृति के साथ जुड़ी हुई है। यह मंदिर एक ऐसी मानवीय त्रासदी और कलात्मक सिद्धि का साक्षी है, जिसे भावनात्मक दृष्टि से भी महसूस किया जा सकता है।

निष्कर्ष

‘एक हथिया देवाल’ केवल पत्थरों से बना एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, भावनाओं और कला की मिश्रित गाथा है। यह न केवल उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण है, बल्कि इस बात का स्मरण भी कराता है कि कैसे कला और भावना कभी-कभी पूजा से भी ऊपर हो सकते हैं।

सरकार और समाज को चाहिए कि इस जैसे विरले ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस गौरवशाली विरासत से परिचित हो सकें।

 

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